स्त्री

स्त्री ,एक संघर्ष

Smriti Dubey

4 months ago|less than a minute read

132

जिस स्त्री के कोख से सभ्यता एवं समाज का जन्म होता है वही सभ्यता एवं समाज उसी स्त्री को बोतल में बंद करके रखती है। और जो सभ्यता स्त्री के पैर की बंधन बन रही है उस सभ्यता को एक स्त्री के स्वतंत्रता के आड़े आने का क्या प्रयोजन हो सकता है?

प्रयोजन पुरुष जाति का उत्थान है

आज भी हमारे समाज में कुछ ऐसे अराजक तत्व है जिन्हें उनकी समर्थक का अनुभव हो चुका है जिन्हें बहुत ही भली-भांति पता है कि वह एक स्त्री के सामने कुछ भी नहीं है।

अब भला स्त्री को अपने पैर की जूती समझने वाले लोग स्त्री से कैसे अपनी हार एवं उसके द्वारा अपनी झूठी रियासत में हार कैसे बर्दाश्त कर सकते हैं ?

बस अपनी कमजोरी एवं झूठी शान की सुरक्षा के लिए ही स्त्री द्वारा जनि हुई समाज एवं संस्कृति को उसके ही उत्थान के विरोध में उपयोग में ला रहे हैं । और जो संस्कृति स्त्री के पैर का बंधन बन रही है वह संस्कृति हमारी है ही नहीं । वह समाज के अराजक तत्वों द्वारा उनकी असमर्थता को छुपाने के लिए उन्हीं के द्वारा निर्मित चक्रव्यू है , जिसमें स्त्री एक अभिमन्यु का किरदार निभा रही है । जिसमे उसे भेज तो दिया जाता है परंतु विजय कैसे प्राप्त करना है यह नहीं बताया जाता । हम एक स्त्री जिसे हम "अबला" कहते हैं उससे ये आशा रखते है की वो अबला उनके द्वारा रचित चक्रव्यूह में योद्धा बने । अगर हमारा समाज स्त्री को "अबला" के उपाधि से "योद्धा"के उपाधि तक ले जाने की इतना दृढ़ लालसा रखता है तो ये दुष्चक्र क्यों?

एक समाज और सभ्यता को निर्मित करने वाली स्त्री की निर्मम हत्या उसी समाज और सभ्यता द्वारा कर दी जाती है।

समय की धूर्तता तो देखिए, यह कैसे परिवर्तित हो रहा है और मानव जाति की नासमझी तो देखें इसको फैशन बोल कर के अपनी समरसता को प्रदर्शित कर रहा है।

बीते समय में धर्म एवं परंपरा को एक नई पहचान देने के लिए हमने गैरों से युद्ध लड़ा ।और जब अपने ही लोगों की वजह से यह अपनी स्वर्ण समरूपता की गरिमा में कमी महसूस कर रहा है तो अब हम चुप क्यों है?

क्यू अब क्यों हम सब हत्यारे बन रहे हैं?

एक देश के भीतर उसके परंपरा की संरचना के लिए विभिन्न देशों या समूहों के बीच सशस्त्र समर हो सकता है लेकिन जब वह अपने हो तो उनके साथ उनके पाप के भागीदार बनने के ही मार्ग का चयन किया जाता है। बीते समय काल में हम शक्ति की आराधना के साथ-साथ नारी के गौरव का अभिमान रखते थे ।दरअसल नारी ही शक्ति का स्वरुप है यह हमारी शिक्षा थी । परंतु समय बीतता गया अब इस शिक्षा की काया का सूर्यास्त हमेशा के लिए हो गया ,अब तो नारी को उनके उत्थान का सांत्वना दे करके उसके अस्तित्व के साथ खेला जा रहा है ।

नारी के उत्थान को WOMEN EMPOWERMENT का tag देकर उससे उसी की सभ्यता को छीनना, उसको हमारे भारतीय संस्कृति एवं परंपरा से दूर करना , पश्चिमी सभ्यता का अनुसरण करने को हम महिला सशक्तिकरण की समरसता बताते हैं ।

और जब वही नारी उनके बताए गए पथ का अनुसरण करके उनके महिला सशक्तीकरण वाली policy का अंगीकार कर लेती है तो यही लोग उसके चरित्र पर उंगली उठाते हैं। और अगर वो उनके पथ का तिरस्कार कर अपना मार्ग स्वम प्रशस्त करें तो नारी ही नारी के आलोचक बन जाती है । आलोचक बनने वाली होती कौन है?

यह वही है जो अपनी समरसता और आत्मसम्मान का बलिदान दे चुकी हैं , और उन्हें आलोचक का भी कार्यभार हमारे वर्तमान समाज द्वारा सौंप दिया गया है । आलोचनाओं एवं आलोचकों की दृष्टि से दूर रहना तो असंभव है परंतु उनके मध्य रहकर अपनी एवं अपने संस्कृति की गरिमा बनाए रखना ही नारी शक्ति की ही पहचान है ।

शक्ति का अवतार तभी हुआ जब संसार में असुरों की संख्या दिन दुगुनी रात चौगुनी बढ़ती जा रही थी और पृथ्वी देवी अपना अस्तित्व खो रही थी। शक्ति के अवतार के साथ योगिनियों का भी अवतरण हुआ। ठीक उसी प्रकार नारी भी अपना अस्तित्व खो रही है और ये कहने में कोई संदेह नहीं है की शक्ति का पुनरावतार अवश्य होगा ।

यद्यपि हम पश्चिमी सभ्यता के ओर बल दे रहे और उसका अनुसरण करना एकमात्र विकल्प है इस समाज में रहने का तो ऐसे समाज की हमे कोई आवश्यकता नहीं। जिस पश्चिमी सभ्यता के लिए हम अपनी स्वर्णीम इतिहास को दबाकर उस सभ्यता की तरफ बढ़ रहे जिसके इतिहास में स्त्री की दशा अंधकारमय चित्र का पूरा विश्व गवाह हैं।

हमारी भारतीय संस्कृति में स्त्री को शक्ति माना गया है और इस संस्कृति की सूर्य को डूबने से बचाना ही हमारी जिम्मेदारी है।

नारी का उद्गम ही उत्थान के लिए हुआ है।

132

Smriti Dubey

Hi, I'm Smriti Dubey.

Comments

more

Read More